Thursday, July 7, 2011

हरियाणा-गैर जाट खिसक रहे है-कांग्रेस खेमे से

(सिरसा) हरियाणा प्रदेश के अधिकतर गैर जाट मतदाताओं का कांग्र्रेस से मोह भंग हो रहा है और धीरे धीरे किसी ऐसे प्लेटफार्म की तरफ मुडऩे की फिराक में है, जहां उन्हें मान-सミमान और अधिकतर मिल सके । ऐसी स्थिति में गैर जाटों को लंबे समय तक नेतृत्व देने वाले पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बाद उनके साहिबजादे व हजकां सुप्रीमों कुञ्लदीप बिश्र्रोई की तरफ गैर जाटों की निगाहे है, जिनसे गैर जाटों के लांभावित होने की संभावना व्यक्तञ् की जा रही है, परंतु कुञ्लदीप बिश्नोई गैर जाटों पर खरा उतरते नजर नहीं आते। गैर जाटों के लिए प्रदेश में बसपा उार प्रदेश के विधानसभाई चुनावी परिणाम उपरांत जरू सक्रिञ्य हुई थी और タयास लगाया जाने लगा था कि हरियाणा की राजनीतिक तस्वीर में बदलाव आएगा, परंतु बसपा कोई करिश्मा न दिखा सकी। बसपा की सक्रिञ्यता ने कांग्रेस की चिंताए तो बढ़ा दी थी, मगर विधानसभा में एकमात्र बसपा विधायक का कांग्रेस को समर्थन देने से बसपा के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्र्रचिन्ह लग गया। प्रदेश में साारूञ्ढ़ कांग्रेस, जो निर्दलीय तथा हजकांई से कांग्रेसी बने विधायकों से चल रही है, से गैर जाटों की दूरी अपनी अनदेखी के चलते है। मुख्यमंत्री भुपेंद्र सिंह हुड्डा अपनों से ही जुझ रहे है, जबकि इनेलो, マााजपा के पास ऐसा कोई कद्दावर नेता नहीं, जो गैर जाटों को नेतृत्व दे सके । हजकां सुप्रीमों कुञ्लदीप बिश्र्रोई जरू स्व.भजनलाल के नाम से लाभांवित हो सकते है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि हरियाणा में गैर जाटों का कांग्रेस से मोहभंग हो रहा है, इसके लिए चिंतित कांग्रेस भी है, मगर उसके पास गैर जाटों को संगठित करने के लिए नेता नहीं है। सांसद वीरेंद्र सिंह अवश्य वैश्य समाज को एकत्रित करने का प्रयास कर रहे है, मगर इसमें उनका मुख्यमंत्री से छाीस का आंकड़ा बाधक बना हुआ है। राज्य में दलित समाज भी कांग्रेस के दूर होता जा रहा है, タयोंकि कांग्रेस इस समुदाय को नेतृत्व प्रदान करवा सकती है। कांग्रेस ने सांसद व केंञ्द्रीय मंत्री सुश्री शैलजा को लेकर दलित समाज को कांग्रेसी ध्वज के नीचे एकत्रित करने का प्रयास किया था, मगर मुख्यमंत्री से शैलजा का छाीस का आंकड़ा आड़े आ गया। सांसद अशोक तंवर के भी मुख्यमंत्री से मधुर संबंध नहीं है, जिस कारण मुख्यमंत्री उन्हें भी दलित समाज का नेतृत्च देना उचित नहीं समझते नहीं है, इसलिए दलित समाज तथा गैर जाट मुख्यमंत्री के छाीस के आंकड़े की बदौलत अपना रूञ्झान करने लगे है। सूत्र यह भी बताते है कि जाट वर्ग का एक प्रभावी ग्रुप मुख्यमंत्री हुड्डा पर दवाब बना रहा है कि गैर जाटों तथा दलितों को कांग्रेसी नेतृत्व न उपलホध करवाया जाये, यदि जरू ी हो तो अपने ही विश्र्वासपात्रों को गैरजाट तथा दलित समाज पर थोपा जाए। प्रदेश में पंजाबी समुदाय की भी यही स्थिति है कि उनका कांग्रेसी रूञ्झान होते हुए भी कांग्रेसी नेतृत्व न देकर उनके रूञ्झान को परिवर्तित कर रही हे। भाजपा, जिनसे कभी गैर जाटों के धनिष्ठ संबंध थे, अब उन संबंधों में बदलाव आया है, タयोंकि भाजपा के पास भी ऐसा कोई कद्दावर नेता नहीं, जो प्रदेश के गैरजाट, दलित समाज या फिर पंजाबी समुदाय को नेतृत्व दे सके । हरियाणा की वर्तमान राजनीतिक तस्वीर से पता चलता है कि राज्य का गैर जाट, दलित व पंजाबी समाज कांग्रेसी नेतृत्व न मिलने के कारण से दूर होता जा रहा है, हालांकि उनके लिए किसी भी राजनीतिक दल में उज्जवल भविष्य नहीं है, मगर कांग्रेसी सोच उपरांत भी कांग्रेस से दूरी बनाना कांग्रेस के लिए शुभ संके त नहीं कहा जा सकता।

Tuesday, September 21, 2010

मंत्री महोदयों ये क्या हो रहा है

ये हैं स्वर्णिम मध्यप्रदेश के कर्णधार। - कानून-कायदों से परे, आरोपों से घिरे। - आधा दर्जन से ज्यादा मंत्रियों के कामकाज पर सवाल स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने का संकल्प लेने वाली प्रदेश की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरकार के आधा दर्जन से ज्यादा मंत्रियों के कामकाज पर सवाल उठ रहे हैं। खुद को मध्यप्रदेश की साढ़े छह करोड़ जनता का हमदर्द बताने वाले इन मंत्रियों ने दोनों हाथों से लूट-सी मचा रखी है। कोई राज्य की योजनाओं को चूस रहा है तो किसी ने केंद्रीय योजनाओं पर बट्टा लगाने की ठान ली है। ऐसे मंत्रियों के भरोसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जनता को स्वर्णिम मध्यप्रदेश का सपना दिखाया है। सरकार की प्राथमिकताएं और संकल्प चाहे जो हों, लेकिन विभागों में इन्हीं का एजेंडा का काम कर रहा है। किसी ने विभाग में अपने ठेकेदार छोड़ रखे हैं, तो किसी ने तबादलों को ही अपना व्यापार बना रखा है।

पारस जैन जी,खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री:- शकर एवं दाल खरीदी के मामले के बाद अब फोर्टिफाइड आटे को लेकर गंभीर आरोपों से घिरे। करोड़ों की आटा खरीदी का काम अपने नजदीकी ठेकेदार और मिल कंपनियों को देने की जुगत में। रिश्वत देने के बावजूद काम नहीं होने पर एक फूड इंस्पेक्टर ने आत्महत्या की। इंस्पेक्टर के परिजनों ने मंत्री पर अरोप लगाए।

रंजना बघेल जी,महिला एवं बाल विकास विभाग में मंत्री :- कुपोषण के कलंक से परेशान सरकार ने पूरा भरोसा जताया , लेकिन धांधली के एक नहीं दर्जनों आरोप उन पर हैं। विभाग को पीए और पति चला रहे हैं। अधिकारियों की पोस्टिंग विभाग का सबसे अहम काम बना हुआ है। पोषण आहार सप्लाई के ठेके में भारी भ्रष्टाचार। अपने गृह जिले धार के ठेकेदारों को ही सर्वाधिक ठेके देने के आरोप उन पर हैं। कुपोषण के निपटने के तमाम प्रयास विफल हुए। अब अटल बाल आरोग्य मिशन में कुपोषण से निपटने के तरीकों से बजट खर्च करने की योजना पर ध्यान है।

रामकृष्ण कुसमारिया जी,कृषि मंत्री :- बाबाजी के नाम से जाने वाले अपने पीए के कारण बदनामी और तमाम आरोप झेल रहे हैं। उन पर पीए के माध्यम से वसूली के आरोप हैं। पशुपालन मंत्री रहते हुए मछली ठेके गलत तरीके से दिए, जिस पर विवाद हुआ। इसी वजह से उनसे विभाग छिना। पिछले दो साल से जैविक नीति का राग अलाप रहे हैं, लेकिन आज तक नीति का अता-पता नहीं। मंत्री से पहले जब सांसद थे, तब मिस्टर टेन परसेंट कहलाते थे। मंत्री के रूप में भी यही पहचान। अधिकारियों में नूरा-कुश्ती कराने में माहिर।

सरताज सिंह जी,वन मंत्री :- वन विभाग के दागी अफसरों को बचाने में हमेशा आगे रहे। कई अफसरों के दोषी करार होने के बाद भी कार्रवाई नहीं की। वन माफिया को संरक्षण देने के आरोप। बैतूल के जंगजों में मिले बंगर मामले में विभाग की लचीली कार्रवाई।

अर्चना चिटनीस जी,स्कूल शिक्षा मंत्री :- स्कूल चलें हम और माध्यमिक शिक्षा अभियान को पलीता लगाया। स्कूल यूनिफार्म मामले में घोटाले के आरोप। सभी ठेकेदारों को अपने गृह नगर बुरहानपुर स्थित लैब से कपड़े का परीक्षण कराने के नाम पर वसूली। इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को हस्तक्षेप करना पड़ा। स्कूलों में सेवाभारती की पुस्तक देवपुत्र की सदस्यता के मुद्दे पर सरकार की थू-थू कराई। माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत स्कूलों में बिना टेंडर के ग्रीन बोर्ड लगावाए।

राजेंद्र शुक्ल जी, ऊर्जा एवं खनिज मंत्री :- खनिज माफिया को संरक्षण दिया। अपने गृह जिले रीवा के पड़ोसी जिले सतना में समर्थकों को खनिज लूट की खुली छूट दी। कटनी और अन्य स्थानों पर खनिज चोरी पर आंखें बंद किए हुए हैं। ऊर्जा विभाग से एमओयू कराकर उन्हें लाभ पहुंचाने के आरोप।

अजय विश्नोई जी,पशुपालन,मछलीपालन मंत्री :- गैर परंपरागत ऊर्जा स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए दवा खरीदी घोटाले के आरोपी। लोकायुक्त में मामला दर्ज। स्वास्थ्य विभाग में महाघोटाले के आरोपी तत्कालीन स्वास्थ्य आयुक्त राजेश राजौरा और लघु उद्योग निगम के बीएम सिंह सहित अभय विश्नोई के खिलाफ आयकर की रिपोर्ट। विश्नोई को छोड़ दोनों अधिकारियों पर कार्रवाई हुई। इन कारगुजारियों से मंत्री पद तो गया, लेकिन जुगाड़ लगाकर फिर से मंत्री बने। पशुपालन, मछलीपालन के साथ मलाईदार अपरंपरागत ऊर्जा विभाग भी मिला।

इसका मतलबय है :- अगर मुख्यमंत्री महदोय ध्यान ना दे तो चलने दो अपना धन्धा पानी यही अपना रोजी रोटी चलेने दो। यह है मंत्रीयो का रवईया। इसका मतलब होने दो धान्धली कोई देखने वाला नही है चलेन दो धान्धली ।
अब इन मंत्रियों पर नजर है



Sunday, September 19, 2010

भुक्खड़ पत्रकार और शिवराज का लंगर

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सरकारी खर्चे से भोजन कराने का बहुत शौक है.यही कारण है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आवास का सत्कार व्यय सालाना एक से दो करोड़ के आस-पास बैठता है. वैसे यहां हम सीएम शिवराज सिंह चौहान की फिज़ूलखर्ची की चर्चा नहीं कर रहे हैं. चर्चा तो उनके लंगर के आयोजन की है.हुआ यूं कि 2 सितम्बर श्री कृष्ण जन्माष्टमी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्रकारों को रात्रिभोज पर बुलवाया. सीएम का पीआर संभालने वाले अधिकारी सभी को फोन करते हैं, इस क्षेपक के साथ..."सपरिवार आइयेगा.बहुत सेलेक्टेड लोगों को बुलाया गया है. लोकल मीडिया तक को नहीं बुलाया गया. ज़रूर आइये."

मैं बता दूं, इस क्षेपक की ज़रूरत क्यों पड़ी. दरअसल जब भी सीएम के यहां से सपरिवार आने का न्योता होता है, कुछ लोगों को छोड़कर कोई परिवार लेकर नहीं जाता, क्योंकि वहां लंगर जैसा माहौल रहता है. कल इत्मीनान कराया गया तो कुछ लोगों ने हौसला कर लिया.सुबह से ही पत्नियों को ताकीद कर दी गई कि शाम को सीएम साहब के घर भोजन पर चलना है. शाम को कई बड़े अखबारों के मालिकान और संपादकनुमा / वरिष्ठ पत्रकार अपनी-अपनी पत्नियों के साथ पहुंच गए. उम्मीद थी कि माननीय शिवराज जी सपरिवार उनकी अगवानी करेंगे लेकिन देख कर भौचक रह गए वहां हमेशा की तरह कार्यकर्ता सम्मलेन जैसा माहौल है.

हज़ारों की तादात में छोटे, बड़े, मंझोले, लम्बे, नाटे, काले, पीले, गोरे लोग पहले से कुर्सियों पर काबिज़ हैं. बैठने को जगह नहीं. गेट पर अगवानी कर रहे थे भाजपा भोपाल के पूर्व और वर्तमान अध्यक्ष. अखबार मालिक तो कई सारे संभावित लाभ-शुभ के चलते कुछ कह नहीं सकते थे, लिहाजा जहां जगह मिली, कुर्सियों पर सपरिवार धंस गए. जो बच गए वे सीएम हाउस में लगे पेड़ों पर पुश्त टिकाकर खड़े हो गए. वहां एक मंच भी बना था जिसमे रविन्द्र जैन जी रामानंद सागर की रामायण मार्का स्वर लहरियां बिखेर रहे थे.पास ही जो भोजन के पंडाल थे वहां ऐसा माहौल मचा था,जैसा किसी भी
रेलवे स्टेशन पर शताब्दी/राजधानी एक्सप्रेस की सफाई के वक्त बचे हुए खाने पर स्टेशन के आस-पास रहने वाले अनाथ लोग टूटते हैं.

जो पहली बार बीबीयों के साथ सीएम के घर अपना रौब गांठने गए थे उनके अरमान ठंडे पड़ गए.जिनके साथ थोड़ा बहुत बोलना सीख चुके बच्चे थे,वे पापा को कोहनी मारते कहने लगे,"पापा चलो कहीं और खाना खायेंगे पर यहाँ नहीं खायेंगे." खुद को तोप मानने वाली पत्रकारीय कौम भौचक थी कि क्या करें.अखबारों के मालिकों की मौजूदगी में गुस्सा भी कैसे झल्काएं. कहीं ये भी अखबार की "पॉलिसी " के खिलाफ बात न हो जाए. क्योंकि आजकल तमाम पत्रकार खबर लिखने से पहले अखबार की "पॉलिसी" पर ज़रूर विचार करते हैं.

बहरहाल लोग कुढ़ते रह गए और मज़बूरी में भूखे पेट वहां से पलायन करना पडा.पत्नियों की तो चांदी हो गई क्योंकि ज्यादातर पतियों ने उन्हें मज़बूरी में होटल में ले जाकर डिनर दिया. इसमें वैसे देखा जाए तो सबसे बड़ा दोष जनसंपर्क आयुक्त का है, जो कार्यक्रम को ठीक तरह से मैनेज नहीं कर पाए.मुख्य मंत्री के घर पर लंगर ही होता है ये सभी जानते हैं,तो उन्हें ये क्षेपक वाला फोन पत्रकारों को नहीं करना था. यदि किया था तो उन्हें शिवराज से चिरोरी करना था कि "सर सिर्फ पत्रकारों को ही आज बुला लीजिये, बाकियों को कल या और किसी दिन बुला लेते हैं." लेकिन नए जन संपर्क आयुक्त शिवराज सिंह चौहान की उस "यस सर वाली आईएएस ब्रिगेड" से आते हैं, जिनके लिए कोई तर्क देना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है. लिहाजा वे मौन रहे. न केवल मौन रहे बल्कि खुद चुपचाप एक कुर्सी में बैठे रहे.

हद तो तब हो गई जब मुख्यमंत्री महज 15 मिनट के लिए आये और चले गए.बताया गया कि उन्हें दो दिन से बुखार है. सवाल ये उठता है की जब सीएम को बुखार था तो उन्होंने पत्रकारों को भोज पर बुलाया ही क्यों? किसने कनपटी में रिवाल्वर रख कर धमकाया था कि हमें डिनर पर बुलाओ? अखबार मालिकों को भी बुलाकार क्या सीएम अपने व्यवहार से अपने ओहदे का भान करना चाहते थे? खैर जो भी हो, इतना ज़रूर हुआ है कि इसे मुख्यमंत्री की यदि पीआर कवायद समझा जाए तो इसमें पीआर बढ़ा नहीं कमज़ोर हुआ है, क्योंकि जो भी पत्रकार उस दिन वहां गया, वो गाली देते हुए ही वहां से लौटा है. ये वही जन संपर्क आयुक्त हैं जो सीएम के पैतृक गाँव में दलितों के साथ भेदभाव वाली खबर को हैंडल नहीं कर पाए थे और इस खबर ने शिवराज की बहुत भद पिटवा दी थी.

Friday, May 7, 2010

यदि कोई बाधा न आई तो प्रभात का अध्यक्ष बनना तय

मध्यप्रदेश में प्रभात झा का अध्यक्ष बनना लगभग तय है यदि कोई बाधा न आई तो। पार्टी की स्थापना से लेकर अब तक दो अवसर ही ऐसे आए हैं जब भारतीय जनता पार्टी में चुनाव की स्थिति बनी है। हालांकि राज्यसभा सदस्य प्रभात झा को नकराने भारतीय जनता पार्टी में पूर्व केंद्रीय मंत्रियों में फग्गनसिंह कुलस्ते, डा. सत्यनारायण जटिया चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी में है, वहीं सांसद भूपेंद्र सिंह के भी चुनाव मैदान में उतरने की चर्चा है।
भाजपा में इस बार निर्विरोध चुनाव की स्थिति बनती नजर आ रही हैं। पिछले एक माह से प्रदेश अध्यक्ष को लेकर दावेदारों की लंबी सूची थी, जो कि सिमट कर अब तीन - चार की संख्या में ही रह गई हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी की मंशा के अनुरूप तो मध्यप्रदेश अध्यक्ष उनकी पसंद से नियुक्त होना था, लेकिन जिस तरह गुटबाजी उभरी और दावेदारों की संख्या बढ़ने लगी तो नितिन गड़करी ने भी अपना इरादा बदल दिया और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप चुनाव कराने पर अपनी सहमति जता दी। इसके बावजूद बावजूद पार्टी के बड़े नेता इस मिशन में भी लगे रहे कि प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर सभी एक मत हो जाए। लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सवक संघ के सह
कार्यवाह सुरेश सोनी की पसंद राज्यसभा सदस्य प्रभात झा, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खेमे के नेताओं को पसंद नहीं आए। इसी वजह से पार्टी में एक गुट प्रभात झा को छोड़ किसी अन्य पर एकमत होने की रणनीति बनाता रहा। इस संदर्भ में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुमित्रा महाजन के दिल्ली स्थित
सरकारी बंगले पर पूर्व और वर्तमान गठन से अब तक दो बार हुए हैं चुनाव सांसदों की एक बैठक भी हुई। इस बैठक में सर्व सम्मत एक नाम तय हो भी गया, उधर दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष नितिन गड़करी और राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल से पूर्व केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते और सत्यनारायण जटिया
ने अपनी दावेदारी को लेकर मुलाकात की, वहीं सांसद भूपेंद्र सिंह ने भी इन दोनों नेताओं से बातचीत की। सूत्र बताते हैं कि पार्टी नेताओं ने दावेदारों को संकेत दिए हैं, लेकिन आज दोपहर दिल्ली में प्रभात झा के नाम पर सहमती बन गई। उनके निवास पर बधाई देनेवालों का तांता भी लगने लगा है। पार्टी के बड़े नेताओं के संकेत मिलने के बाद चर्चा यही है कि प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चुनाव कशमकश भरे माहौल में होंगे। उल्लेखनीय है कि भाजपा की स्थापना के बाद से अब तक दो बार ही प्रदेश
अध्यक्ष को लेकर चुनाव हुए है जबकि अन्य अवसर नियुक्ति के ही रहे। वर्ष १९९० में हुए प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में लखीराम अग्रवाल के खिलाफ कैलाश जोशी चुनाव मैदान में थे जबिक वर्ष २००० में हुए चुनाव में विक्रम वर्मा के खिलाफ शिवराज सिंह चौहान चुनाव लड़े थे। उस समय जोशी और चौहान को पराजय का सामना करना पड़ा था।

शिवराज सिंह चौहान को क्यों नहीं पसंद प्रभात
शिवराज सिंह चौहान को प्रभात झा पसंद नहीं है। इसीलिए तो उन्होंने पार्टी नेतृत्व के सामने न केवल अपना विरोध जताया था बल्कि अपने इस्तीफे तक की बात कह डाली थी। सुत्र यही बताते है कि अब शिवराज के इस विरोध पर गौर करें तो वे कदापि नहीं चाहते कि प्रदेश में कोई कदावर नेता आए और संगठन मुखिया की हैसियत से उन्हें निर्देश दे। उल्लेखनीय है कि शिवराज सिंह ने पिछले दिनों शिवसेना सुप्रीर्मो बाल ठाकरे की तर्ज पर एक कार्यक्रम में कथिक तौर पर कहा था कि प्रदेश में बिहारियों का क्या काम ? उन्हें उघोगों में रोजगार देने के बजाए स्थानीय लोगों को महत्व दे। जिसको लेकर खासा बवाल मचाया। शिवराज द्वारा उस समय कही गई बातें आज प्रभात झा के मामले में फीट लग रही है। सूत्रों के अनुसार शिवराज सिंह प्रभात झा के विरोध के फलस्वरूप ही अपनी पसंद भूपेंद्र सिंह अथवा फग्गन सिंह पर केन्द्रित कर दी है। अब यह तो कल ही पता चलेगा कि प्रभात झा के खिलाफ कौन, सामने होगा। मगर वृदांवन गए प्रदेश प्रतिनिधियों को लेकर चर्चा यही कही कि इन्हीं के दम पर चुनावी माहौल तय किया जाएगा। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में प्रदेश के ७० प्रदेश प्रतिनिधियों की भुमिका अहम होगी। सूत्रों के अनुसार शिवराज के इनर सर्किले ने राज्यसभा सदस्य प्रभात झा को सर्वम्मत अध्यक्ष बनने से रोकने के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं तथा अपना ध्यान प्रदेश प्रतिनिधियो को हायर किया है। प्रतिनिधिइन दिनों वृंदावन में भागवत कथा का आनंद ले रहे हैं। बताते हैं कि ये प्रतिनिधि देर रात तक भोपाल आ जाएंग।

Saturday, April 24, 2010

इलाज के अभाव में मौत शिव सरकार की सहायता घोषणा फर्जी निकली

थोथी घोषणाएं कर वाहवाही लूटने वाले मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को प्रशासन कितनी गंभीरती से लेता है, इसक एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें मुख्यमंत्री द्वारा घोषणा सहायता राशि में तो कटौती की ही गई, स्वीकुत राशि का भी समय पर भुगतान नहीं किया गया। इस कारणएक व्यक्ति को असमय मौत के मुंह में जाना पड़ा। इतने गंभीर मामले में एक भी अधिकार को जिम्मेदार नहीं ठहराने से सरकार की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।

भोपाल मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान मद से सहायता राशि में लापरवाही सामने आई है। समय पर यहायता राशि न मिलने से एक व्यक्ति की मौत हो गई और सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। इससे मुख्यमंत्री शिवराज चौहान संवेदनशीलता की पोल खुल गई है। उलेखनीय है कि रेलवे में कार्यरत ब्रजभूषण सिरवैया का लीवर खराब हो गया था, जिसे नई दिल्ली के सर गंगराम अस्पताल में भर्ती किया गया था। सिरवैया की पत्री ममता सिरवैया ने अपना लीवर देकर पति की जान बचाने की पहल की, किंतु इस पर लगभग २५ लाख रूपए खर्च बताया गया। श्रीमती सिरवैया ने रेल विभाग में आवेदन देकर यह राशि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया, जहां से २० लाख रूपए स्वीकुत किए गए। कुछ राशि उन्होंने परिजनों से जुटाई।फिर भी ५ लाख रूपए कम पड़ रहे थे। श्रीमती सिरवैया ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को आवेदन देकर शेष राशि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया। इस पर मुख्यमंत्री ने पांच लाख रूपए देने की घोषणा की। जनसंपर्क विभाग ने सहायता राशि स्वीकृत करने संबंधी समाचार भी जारी किया,जो लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने आदेश क्र. २१३ के तहत मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान कोष से पांच लाख की बजाय चार लाख रूपए देने का आदेश ८ जनवरी को कलेक्टर भोपाल को दिया। इसके बाद क्या हुआ, यह किसी को पता नहीं चला। उधर समय पर इलाज न हो पाने के कारण अस्पताल में भर्ती ब्रजभूषण सिरवैया की मौत हो गई। खास बात यह है कि यह सहायता राशि श्रीमती सिरवैया को आज तक नहीं मिल पाई है। प्रशासन की इस लापरवाही के कारण एक व्यक्ति की असमय मौत हो गई और इसके लिए आज तक किसी की जिम्मेदारी तय नहीं की गई है।

Saturday, February 20, 2010

कागजों में जनकल्याण जनता हुई हलाकान

महिला आयोग ने कागजों में फूंके करोड़ों
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री लाड़ली लक्ष्मी, जननी सुरक्षा और कन्यादान योजना के माध्यम से जनकल्याण करने के लाख दावे करें, किंतु महिला आयोग उनके दावों की कलई खोल रहा है। खास बात यह है कि इस आयोग ने करोड़ों रुपए तो फूंक डाले, किंतु लोगों को न्याय नहीं मिल सका और अब आयोग द्वारा किए गए खर्च का विवरण देने में आनाकानी की जा रही है। यहाँ यह तथ्य भी गौरतलब है कि आयोग की कथित सक्रियता के बावजूद अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ता ही गया।

महिला आयोग में राजनीतिज्ञ :- मप्र राज्य महिला आयोग अधिनियम 1995 के अनुसार राज्य महिला आयोग का गठन किया गया। इस अधिनियम के अध्याय-2 में उल्लेख है कि आयोग की अध्यक्ष विख्यात महिला सामाजिक कार्यकर्ता होगी या कोई वृत्ति करने वाली ऐसी विख्यात महिला होगी, जो महिलाओं के हित के लिए प्रतिबद्ध होगीं, जिसे राज्य सरकार द्वारा नाम निर्देशित किया जाएगा। आयोग की मौजूदा अध्यक्ष कृष्णकांता तोमर हैं, जो न समाजसेवी हैं, न विख्यात महिला। उनकी योग्यता मात्र यह है कि वे भाजपा से जुड़ी हैं। इसी अध्याय की कंडिका तीन तथा चार में कहा गया है कि आयोग की सदस्य दो ख्यातिप्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा तथा स्वास्थ्य क्षेत्र की दो विशेषज्ञ होंगी। आयोग की मौजूदा सदस्य कमला वाडिया, मनोरमा गौर, सुषमा जैन और अमिता चपरा उपरोक्त विशेषज्ञता नहीं रखती हैं तथा उनकी योग्यता सिर्फ भाजपा नेताओं के परिवार से जुड़ी होना ही है।

ढेर सारा अमला :- उपरोक्त अध्यक्ष, सदस्य के अलावा आयोग में 30 अधिकारी, कर्मचारी और भृत्य-चौकीदार हैं, जिन्हें हर माह 25 लाख 4776 रुपए वेतनमान दिया जाता है। आयोग को वर्ष 2005-06 में 77 लाख 30 हजार रुपए बजट आवंटित हुआ, जिसमें 72 लाख 92 हजार 237 रुपए खर्च किए गए। वर्ष 2006-07 के बजट 93 लाख, 86 हजार में 88 लाख, 39 हजार 534 रुपए खर्च हुए। वर्ष 2007-08 में 1 करोड़ 13 लाख, 50,000 रुपए के बजट में से 86 लाख 12 हजार 261 रुपए खर्च हुए।

बजट के साथ अपराध भी बदे :- महिला आयोग द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2005-06 में दहेज हत्या के 203, दहेज प्रताडऩा के 532, बलात्कार के 255, अपहरण के 69, हत्या के 82, आत्महत्या के 15, कार्यस्थल पर प्रताडऩा के 251, घरेलू अत्याचार के 512, संपत्ति विवाद के 250, भरण पोषण के 47, बच्चों से संबंधित अत्याचार के 14 और अन्य प्रकार के 1275 प्रकरण, यानी कुल 3,514 प्रकरण पंजीबद्ध किए गए। वर्ष 2006-07 में 261 दहेज हत्या, 793 दहेज प्रताडऩा, 404 बलात्कार, 236 अपहरण और 188 हत्या के प्रकरणों के साथ ही कुल 5978 प्रकरण दर्ज किए गए।

35 फीसदी निराकरण :- महिला आयोग को वर्ष 1998 से 2003 तक कुल 5860 प्रकरण प्राप्त हुए, जिनमें से मात्र 2105 प्रकरणों का ही निपटारा किया जा सका। शेष 3706 प्रकरण नस्तीबद्ध कर दिए गए। छह साल में आयोग को करोड़ों का बजट मिला और काम 35.92 फीसदी ही हुआ, जो उसकी कार्यक्षमता तथा उपयोगगिता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

कार्य विवरण कार्यालय में :- आरटीआई एक्टिविस्ट सुश्री शेहला मसूद ने महिला आयोग में सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी मांगी कि आयोग की बैठकों का विवरण मय तारीख के उपलबध कराया जाए तो आयोग की ओर से दी गई सूची में बताया कि विवरण कार्यालय में उपलब्ध है। प्रश्न यह है कि जब प्रत्येक बैठक का कार्य विवरण रजिस्टर में दर्ज है तो उसका विवरण क्यों नहीं दिया जा रहा है? क्या इससे इस शंका को बल नहीं मिलता है कि आयोग में बैठकों के नाम पर फर्जीवाड़ा होता है और सरकारी बजट का दुरुपयोग किया जाता है? अपीलार्थी ने यह मामला राज्य सूचना आयोग में उठाया है।

अयोग्य कैसे दिलाएंगी न्याय :- राज्य शासन ने महिला थानों में महिला काउंसलर की भी नियुक्तियां की हैं, जिन्हें स्नातकोत्तर होने के साथ ही समाज कल्याण का डिप्लोमाधारक होना चाहिए तथा कम से कम दो वर्ष का अनुभव भी होना चाहिए, लेकिन राजधानी के थानों में एक भी महिला काउंसलर इन योग्यताओं पर खरी नहीं उतरती है। किसी भी महिला काउंसलर के पास सोशल वेलफेयर का डिप्लोमा नहीं है। कुछेक तो मात्र बीए पास हैं और काउंसलर बना दी गई हैं। यही वजह है कि इनके द्वारा गलत समझौते कराने के कारण दोबारा प्रकरण दर्ज किए गए। जब राजधानी की यह हालत है तो प्रदेश के सुदूर अंचलों की स्थिति का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है। यही कारण है कि लोगों में कानून का भय नहीं है और इसी कारण महिलाओं पर अत्याचार के मामले बढ़ रहे हैं।

Saturday, February 13, 2010

परस्त्रीगमन में मगन मध्यप्रदेश की नौकरशाही

भोपाल। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार भले ही साफ-सुथरी छवि बनाने में जुटी हो। लेकिन सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन करने वाले नौकरशाह अय्याशी और रंगीनमिजाजी में डूबे हुए हैं। जिलों में पदस्थ कलेक्टर्स से लेकर प्रमुख सचिव स्तर के आला अफसर तक सब के सब प्रेम प्रसंगों में उलझे हैं। ने ऐसे आला अफसरों की खोजबीन की, तो उनकी रंगीन कहानियां कुछ इस तरह सामने आई। आला अफसरान को अय्याशी का रोग इस तरह लगा है कि वे अपनी स्टेनो तक को नहीं छोड़ रहे हैं। एक आईपीएस अफसर तो अपनी मातहत महिलाकर्मियों से भी मुंह काला कर रहे हैं। कुछेक अफसरान ने अपनी मातहत से शादियाँ कर ली हैं, तो कुछ अपनी अधीनस्थों को बाहर ले जाकर भी अपनी कामपिपासा शांत कर रहे हैं। खास बात यह है कि महिला आईएएस भी ऐसे मामलों से अलग नहीं हैं।

केस नंबर एक :- ये जनाब पंजाब कॉडर के अफसर हैं। अपनी पत्नी से अलग रहने वाले इस अधिकारी की तीन प्रेमिकाएं हैं। जिनके नाम कविता, ममता और संजना हैं। ममता तो इन दिनों साहब के घर पर ही रहती हैं। इनके मकान में देर रात तक उक्त महिला शराब परोसती है। प्रमुख सचिव स्तर के यह अफसर जिस विभाग में आयुक्त के पद पर पदस्थ थे, उस विभाग की डीओ महिला से इस अधिकारी का प्रेम प्रसंग चलता था, लेकिन अब दोनों का विभाग बदल गया है। अफसर जहां दूसरे विभाग में है, तो महिला दूरदराज के जिले में पदस्थ है। इस कारण अफसर ने नई महिला प्रेमिका तैयार कर ली है। इसके एवज में अफसर उक्त महिला को करोड़ों का छपाई का काम दे चुके हैं। वह महिला जब भी दफ्तर में आती है, अधिकारी हर काम उसे थमा देते हैं। वैसे उक्त अफसर की पत्नी भी कमिश्नर स्तर के पद पर पदस्थ है।

केस नंबर दो :- हाई प्रोफाइल इस अफसर की दो प्रेमिकाएं हैं। एक अफसर है तो दूजी प्रोफेशनल। भ्रष्टाचार के मामलों में हमेशा उलझे रहने वाले इस अफसर को अक्सर चार इमली में मार्निंग वॉक पर डेटिंग करते हुए देखा जा सकता है। जबकि दूसरी प्रेमिका जो एक प्रोफेशनल हैं, देर रात भोपाल के हेरिटेज होटल में गलबहियां करते हुए दिखती हैं।

केस नंबर तीन :- ये जनाब इश्क के मामले में बड़े ईमानदार हैं। बीवी के अलावा यह सिर्फ एक अन्य स्त्री से प्रेम करते हैं। चूंकि स्वयं आईएएस हैं तो प्रेम भी आईएएस महिला से ही हुआ। पद की गरिमा का ध्यान इन्हें इसलिए नहीं है, क्योंकि उनकी प्रेमिका इनसे उम्र में काफी छोटी हैं। सो कोई शंका नहीं करता। ये जहां जिस जिले में पदस्थ होती हैं, वहां उनसे बिना नागा मिलना इनके कर्तव्य में शुमार है। पिछले छह साल से चल रहे इस प्रेम प्रसंग में यह खास बात है कि उक्त महिला अफसर की पोस्टिंग कभी भोपाल से दूरस्थ इलाके में नहीं हुई।

केस नंबर चार :- नौकरशाहों में काफी मुखर यह अफसर प्रेम प्रसंग में भी काफी मुखर हैं। इनकी पत्नी भी आईएएस हैं। वे काफी शांत, सुशील और सौम्य हैं। किंतु इसके विपरीत यह अफसर आफिस टाइम में अपनी प्रेमिका के साथ भोपाल के नौकरशाहों के क्लब में बीयर की चुस्कियां लेते देखे जा सकते हैं। इनकी प्रेमिका भी आईएएस हैं। अभी हाल में दिल्ली गई हैं। वैसे इनकी दूरियां अब साप्ताहिक हो गई हैं। क्योंकि ये मोहतरमा शनिवार रात भोपाल आ ही जाती हैं।

केस नंबर पांच :- पूर्ववर्ती सरकार में पावरफुल रहे और अब भी क्रीम पोस्ट पर बैठे इस अफसर का प्रेम प्रसंग कुछ अलग है। इन्हें इंटरनेट पर एक इण्डोनेशिया की बाला से प्रेम हो गया है। पिछले दो साल से चल रहे इस प्रेम प्रसंग से इनकी पत्नी इस कदर परेशान हो गई है कि स्थिति तलाक तक पहुंच गई है।

केस नंबर छह :- महिला बाल विकास विभाग में अपर संचालक के दो पद सरकार ने स्वीकृत किए हैं, जबकि प्रमोशन पाने की दौड़ में पांच अधिकारी भिड़े हुए हैं, इनमें से दो महिलाएं भी शामिल हैं, इस प्रमोशन के चक्कर में एक महिला अधिकारी प्रमुख सचिव पर ज्यादा दबाव बनाने में लगी हैं। इस कारण वह बार-बार एक-एक फाइल को लेकर पीएस के पास जाती है और एक से दो घंटे तक पीएस के पास बैठी रहती है। इससे खफा पीएस ने उक्त महिला को फटकार लगा दी। जिसकी शिकायत उक्त महिला ने अपने पुराने प्रेमी अफसर से कर दी। अफसर की फटकार तथा उक्त महिला को प्रमोशन दिलाने के लिए विभाग के एक पूर्व कमिश्नर प्रमुख सचिव से मिले और उक्त महिला का समर्थन किया। जब यह अधिकारी महोदय उस विभाग में हुआ करते थे, तब उनका इस महिला के साथ प्रेम प्रसंग जमकर चला करता था और इसकी चर्चा अभी भी विभाग के कर्मचारी करते हैं।

केस नंबर सात :- राज्य मंत्रालय में पदस्थ इस सचिव ने हाल ही में एक महिला बाल विकास अधिकारी से शादी की है। खास बात यह है कि इस आईएएस के सभी संगी-साथी प्रमुख सचिव स्तर तक पहुंच गए हैं, जबकि ये साहब सचिव ही हैं। कारण इनकी रंगीनमिजाजी और भ्रष्टाचार है।

केस नंबर आठ :- वन विभाग के एक अधिकारी यूं तो 50 पार हो चुके हैं, पर रंगीनमिजाजी से बाज नहीं आ रहे हैं। इनका दिल अपनी स्टेनो पर ही आ गया। स्टेनो के साथ प्रेम की पींगे बढ़ाते हुए इन्होंने पिछले दिनों उससे शादी कर ली।

केस नंबर नौ :- लोक निर्माण विभाग के एक वरिष्ठ अभियंता को अपनी स्टेनो इतनी भायी कि वे अब उसी के साथ वक्त गुजारते हैं। हालांकि इन्हें चार इमली क्षेत्र में सरकारी आवास आवंटित है, किंतु स्टेनो को कोलार रोड पर एक मकान दिलवा दिया है, जहां इनका प्रेम परवान चढ़ता है।

केस नंबर दस :- लोक निर्माण विभाग के एक आईएएस अफसर रंगीन तबीयत के हैं। इन्होंने सांची में एक महिला को रखैल बना रखा है। यह महिला विभाग में ही दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी है। साहब उसे रायसेन के एक होटल में बुलवाते हैं और अपनी कामपिपासा शांत करते हैं।

केस नंबर ग्यारह :- सत्य का प्रकाश फैलाने वाले एक वरिष्ठ आईएएस अफसर महिला अफसर से प्रेम प्रसंग के कारण चर्चा में हैं। पहले यह महिला अफसर प्रशासन अकादमी में थीं और रात में अक्सर गायब रहती थी। अब यह दिल्ली में पदस्थ है और साहब छुट्टियों के समय रातें रंगीन करने दिल्ली जाते हैं।

केस नंबर बारह :- एक वरिष्ठ महिला आईएएस का दिल एक टीवी स्टार पर आ गया। यह प्रेम प्रसंग कई दिनों तक चला और अब दोनों ने शादी कर ली है। टीवी स्टार भाजपा का स्टार प्रचारक है और मध्यप्रदेश में एक निगम का अध्यक्ष भी रह चुका है।

केस नंबर तेरह:- सतपुड़ा भवन में पदस्थ वन विभाग के एक आला अफसर का अपनी स्टेनो से प्रेम प्रसंग चल रहा है। साहब यदि चार घंटे आफिस में बैठते हैं तो स्टेनो भी इतना ही समय वहीं गुजारती है। कभी-कभी साहब अपने केबिन का दरवाजा अंदर से बंद कर दफ्तर में ही 'शुरू' हो जाते हैं। यदा-कदा वे स्टेनो को बाहर भी ले जाते हैं।

केस नंबर चौदह :- वन महकमे में मुख्य वन संरक्षक पद पर बैठे एक आईएफएस इतने रंगीनमिजाज हैं कि महिलाओं को देखकर उनकी लार टपकने लगती है। कई महिलाओं को बर्बाद करने वाले इस अफसर की करतूतों से परेशान होकर इनकी पत्नी ने इन्हें छोड़ दिया है। इसके बावजूद इनकी आदत नहीं सुधरी है। महिला कोई भी हो, वे उसकी निकटता पाने और उसे अपने जाल में फंसाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं।

केस नंबर पंद्रह :- एक अल्पसंख्यक आईपीएस अफसर महिला इंस्पेक्टर से इश्क फरमा रहे हैं, जो ब्राह्मण समाज की है। पहले यह अफसर रीवा में पुलिस अधीक्षक रह चुके हैं और फिलहाल भोपाल स्थित बटालियन में हैं। इनके प्रेम प्रसंग की पुलिस महकमे में खासी चर्चा है।

केस नंबर सोलह :- पुलिस अधीक्षक स्तर की एक महिला आईपीएस को कोई नहीं मिला तो निरीक्षक स्तर के एक व्यक्ति को ही दिल दे बैठी। दोनों को अक्सर साथ में घूमते देखा गया है। खबर यह भी है कि कभी-कभी दोनों बाहर भी जाते हैं।

केस नंबर सत्रह :- जेल महकमे में अपने प्रचार अभियान के लिए चर्चित एक आला अफसर की नजर इतनी खराब है कि वे अपनी मातहत महिला प्रहरियों को भी नहीं छोड़ते हैं। महिला प्रहरी आसानी से हमबिस्तर हो जाए तो कोई बात नहीं, लेकिन जरा भी टेढ़ी की तो साहब की नजर भी टेढ़ी हो जाती है। वे ऐसी महिला प्रहरियों पर अनैतिक दबाव डालकर अपनी क्षुधा शांत करते हैं।

केस नंबर अठारह :- एक कारपोरेशन में प्रबंध संचालक पद पर पदस्थ अफसर अपनी मातहत महिलाकर्मियों को एक फार्म हाउस पर बुलवाते हैं और वहां रंगरलियां मनाते हैं। इस फार्म हाउस पर कुछ अन्य अफसर और मंत्री भी आते हैं। एक महिलाकर्मी ने इस अफसर की शिकायत पुलिस में भी की थी, जिसे एक वरिष्ठ पुलिस अफसर के हस्तक्षेप के बाद रफा-दफा किया गया।

केस नंबर उन्नीस :- जब नौकरशाही अय्याशी में डूबी हो तो उनके आसपास मंडराने वाले पत्रकार भला कैसे पीछे रहते। एक पत्रकार पर एक महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया तो सनसनी फैल गई, क्योंकि इस सेक्स स्केंडल में एक आईएफएस और तीन आईएएस अफसर के नाम भी सामने आए।

केस नंबर बीस :- मंत्रालय में पदस्थ एक आईएएस का एक महिला प्रोफेसर से प्रेम प्रसंग चल रहा है। गत लोकसभा चुनाव में जब इनकी ड्यूटी राजस्थान में लगाई गई तो साहब अपने साथ उक्त प्रोफेसर को भी ले गए और वहां लोगों को बताया कि यह उनकी पत्नी है। किसी ने फोन पर साहब की पत्नी को सारी जानकारी दे दी। आईएएस पत्नी ने शासन को पत्र लिखकर पूछा कि उक्त अफसर महिला प्रोफेसर को किस हैसियत से अपने साथ ले गए थे।

केस नंबर इक्कीस :- आईएएस स्तर के एक अफसर जब कलेक्टर थे तब एक महिला डीएसपी उनकी नजर में चढ़ गई। साहब ने उसे जमकर भोगा, जिससे वह गर्भवती हो गई। तब साहब ने उसे चलता कर दिया। नौ साल तक यह मामला विभिन्न अदालतों में चला और अब सुप्रीमकोर्ट में विचाराधीन है।

रंगीनमिजाज मंत्री :- ग्वालियर चंबल क्षेत्र के ये मंत्री महोदय तीन वक्त नॉनवेज भोजन पसंद करते हैं। शराब पीने के बाद वे स्वयं अपनी रंगीनमिजाजी के किस्से सुनाते हैं और रात में मुंबई की दो फिल्म अभिनेत्रियों, जिनके नाम प्रीति और दीप्ति हैं, से अपने संबंध होने का स्वयं दावा करते हैं। देर रात उनसे मोबाइल पर बात भी करते हैं।गल्र्स होस्टल में ताकझांक :- आदिवासी कोटे के ये मंत्री अव्वल दर्जे के अय्याश हैं। चूडिय़ों की खनक और घुंघरू की आवाज से ये बेचैन हो उठते हैं। इनका शगल है रात में शराब पीने के बाद आदिवासी गल्र्स होस्टल का दौरा करना। पिछले दिनें भोपाल के पास एक फिल्म की शूटिंग के दौरान अभिनेत्री के नहाने के दृश्य को इन्होंने दो बार रिटेक करवाया। इससे पूर्व इन्हीं मंत्री ने भोपाल के विंड्स एंड वेव्स रेस्टोरेंट पर एक कार्यक्रम के दौरान दिल्ली की एक पीड़ित पत्रकार से छेडख़ानी की थी।

इन्हें गायिका चाहिए :- यह मंत्री महोदय राज परिवार से हैं। शराब पीने के बाद इन्हें गजल सुनने और तवायफों को नचवाने का शौक है। पिछले दिनों इन्होंने भोपाल के पलाश होटल में देर रात शराब पीकर एक भजन गायिका के साथ दुर्व्यवहार किया था। यह खबर सभी अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी।

सज्जन अफसर की सज्जनता :- शिक्षा विभाग के एक अधिकारी की इंदौर यात्रा बड़ी चर्चा में हैं। यह सज्जन बीते दिनों अपने ही विभाग के एक अधिकारी के यहां शादी में गए थे। सज्जन ने इसके लिए सरकारी टूर बना लिया। यहां तक होता, तो भी ठीक था, लेकिन सज्जन अपने साथ एक महिला मित्र को भी ले गए। बताते हैं कि पहले तो सज्जन ने सरकारी टूर की औपचारिकता पूरी की, फिर अधिकारी महोदय के यहां शादी में शरीक हुए। उसके बाद महिला मित्र की चाकरी में लग गए। अब सज्जन की नेक-नीयत पर तो किसी को ऐतराज नहीं, लेकिन संगी-साथी हैरान इस बात पर हैं कि इतनी एनर्जी साहब लाते कहां से हैं!

नहीं लग रहा मन :- भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी का मन नहीं लग रहा। उन्हें एक संभाग का कमिश्नर बनाया गया। मगर थोड़े समय बाद ही भोपाल वापसी की रट उन्होंने लगा दी। मंसूबा पूरा नहीं हुआ। पोस्टिंग की तय अवधि से ज्यादा हो चुका है, मगर भोपाल वापसी नहीं हुई है। मन न लगने की वजह भोपाल में पदस्थ महिला मित्र बताई जा रही है। कमिश्नरी मिलने के बाद मित्र ने ग्वालियर के दो दौरे किए। पहले भी ग्वालियर देख चुकी अफसर साहब के साथ उन स्थानों पर गई जो मशहूर हैं। अपने कार्यकाल में अनेक दौरे भोपाल के अधिकारी महोदय ने किए। दोनों शादीशुदा और बाल बच्चेदार हैं। मगर मित्रता तो मित्रता है। भला मेल-जोल कैसे रुक सकता है। ताजा खबर यह है कि इनकी भोपाल वापसी के लिए भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है। नेताजी और अधिकारी को नतीजे का इंतजार है और मित्र को साहब की वापसी का।

'रेशमी रोशनी' के चर्चे :- शिक्षा विभाग के एक संचालनालय में पिछले कुछ समय से 'रेशमी-रोशनी' के चर्चे छाए हुए हैं! दरअसल, कुछ समय पहले इस शाखा में एक महिला अधिकारी तबादला होकर आई। महिला अधिकारी के 'सौंदर्य' से शाखा के एक साहब इतने प्रभावित हुए कि बस पूरे समय संग-संग रहने की ही कोशिशें होती रहीं। दोनों एक ही जाति-समुदाय से थे, इसलिए प्रेम की पीगें और तेजी से बढऩे लगीं। हाल ये है कि दोनों के प्रेम की चर्चा पूरे विभाग में है, लेकिन जब दोनों राजी, तो कोई क्या करे। इसलिए जिस शाखा में दोनों हैं, उस शाखा के प्रमुख अधिकारी भी बेचारे बस यही कोशिश करते हैं कि दोनों सामने रहें, तो इधर-उधर के काम में लग जाएं।

महिला आईएएस का प्रेम :- अपनी ऊंची कद-काठी और शराबनोशी के लिए चर्चित यह महिला अधिकारी कभी उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से प्रेम प्रसंग के लिए भी जानी जाती थी। हालिया जानकारी यह है कि यह महिला अधिकारी इन दिनों एक उप सचिव स्तर के अधिकारी के साथ प्रेम पींगे बढ़ा रही है तथा दोनों को चार इमली क्षेत्र में साथ-साथ मार्निंग वाक करते भी देखा जाता है। प्रशासनिक क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि पति से दूर रहकर उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से प्रेम करने वाली इस महिला का स्तर इतना क्यों गिर गया है कि अब उप सचिव स्तर के अधिकारी के साथ कदमताल कर रही है?

दिल है कि मानता नहीं :- उच्च शिक्षा से जुड़े़ एक शीर्ष अफसर की रसिकमिजाजी इन दिनों काफी चर्चा में है। इन सज्जन का दिल दो-तीन महिला रिसर्चर पर जब-तब मेहरबान हो जाता है। इसलिए अक्सर उनके साथ के कारण इनके किस्से चर्चित हो जाते हैं। पिछले दिनों सज्जन ने हद इतनी की कि दिल्ली के टूर पर भी एक महिला रिसर्चर को साथ ले गए। टूर में रिसर्च की रिसर्च हो गई और बाकी जो दोनों की मर्जी! इतना और बता दें कि ये सज्जन वास्तु को बहुत मानते हैं, सो रंगीन मिजाजी भी उसी अंदाज में करते हैं। वास्तु वाली रंगीनमिजाजी जानना है, तो वह तो इनकी कोई करीबी ही बता सकती है!

अय्याशी में भी साझेदारी :- वन महकमे में दलाली, कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार में साझेदारी होना आम बात है, लेकिन दो अफसरों ने अय्याशी में साझेदारी की नई मिसाल पेश की है। बताया जाता है कि एक डीएफओ ने अच्छी पोस्टिंग कराने के लिए अपनी साली का सहारा लिया। एक सीसीएफ साहब को साली साहिबा इतनी भायी कि उन्होंने उसे अरेरा कॉलोनी में एक फ्लेट ही किराए से दिलवा दिया। अब सीसीएफ साहब इस फ्लेट में अपनी कामपिपासा शांत करने अक्सर आया-जाया करते हैं और बीच-बीच में मौका पाकर जीजा भी मुंह मारने से नहीं चूकते हैं।

डॉक्टर साहब को लवेरिया हुआ :- स्वास्थ्य विभाग में दूसरी पंक्ति के एक डॉक्टर अफसर का दिल इन दिनों एक स्वयंसेवी संस्था की महिला पर आ गया है। महिला पहले से ही स्वास्थ्य विभाग की सेवा में लगी है, सो अनुदान और बहुत-सी मददें उनकी झोली में हैं। उस पर अब अफसर महोदय का दिल आ गया है, तो बात वीआईपी जैसी हो गई है। बताते हैं बीते दिनों अफसर महोदय कार्यालय से निकले और सीधे महिला के घर। अगले दिन छुट्टी थी, लेकिन फिर भी अधिकारी कार्यालय आए और वहां से कुछ फाइलें लेकर फिर महिला के घर जा पहुंचे। फाइलें क्या थी, यह तो नहीं पता, लेकिन चर्चा है कि नए वित्तीय वर्ष में किसी नए प्रोजेक्ट को विशेष तौर पर महिला के ऊपर न्यौछावर करने के लिए तैयार किया जा रहा है।

घरवाली बाहरवाली :- ऊर्जा विभाग के एक अफसर की प्रेमकथा इन दिनों खूब चटखारे लेकर सुनी-सुनाई जा रही है। यह अफसर हैं तो द्वितीय श्रेणी के, लेकिन काम सारे प्रथम श्रेणी वाले हैं। ये महोदय विद्युत कंपनी की एक महिला के साथ प्रेम की पींगे भी बढ़ा रहे हैं। सब ठीक चल रहा था, लेकिन बात तब सामने आई जब बीते दिनों उनके ही किसी मित्र ने उनकी बीवी को इसकी जानकारी दे दी। मित्र तो अपनी मित्रता दिखा गए, लेकिन महोदय परेशान हैं। पत्नी भी एक संस्था में काम करती है। बस, पत्नी अब उस महिला पर नजर रखती है और महोदय अपनी पत्नी पर।

तलाक की डगर पर :- मध्यप्रदेश कैडर के चार आईएएस अफसर तलाक की डगर पर बढ़ रहे हैं। इनमें से एक अफसर दिल्ली में पदस्थ है। ये चारों आईएएस रंगीनमिजाज तो हैं ही, साथ ही इधर-उधर 'मुंह मारने का भी कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते हैं। लेकिन इनके तलाक की वजह दूसरी है। दरअसल ये अफसरान बढ़ती उम्र में भी प्रेम-प्रसंग में डूबे हुए हैं और तलाक की वजह भी यही है।

महंगी पड़ी टेलीफोन अय्याशी :- लोक निर्माण विभाग के एक आला अफसर को अपनी स्टेनो से टेलीफोन अय्याशी करना महंगा पड़ गया। बात दरअसल यह है कि इस अफसर की पत्नी इंदौर में है और यहां साहब अकेले हैं। सो, साहब ने अपनी स्टेनो से मौखिक अय्याशी करना शुरू कर दी, लेकिन जब साहब रात में भी उसके घर फोन करने लगे तो स्टेनो बिफर गई। उसने पुलिस में शिकायत कर दी। बाद में पुलिस के एक आला अफसर की मध्यस्थता के चलते मामला रफा-दफा किया गया। चार इमली क्षेत्र में रहने वाले इस अफसर पर भ्रष्टाचार के कई आरोप हैं और खास बात यह है कि सिविल इंजीनियर न होते हुए भी इएनसी पद पर बैठे हैं।

महिला अफसर एक दीवाने दो :- स्कूली शिक्षा में एक महिला अधिकारी के इन दिनों बड़े चर्चे हैं। इसका कारण इस सुंदर महिला अधिकारी पर कई अफसरों का दिल आना है। महिला कुछ महीने पहले ही पदस्थापना पर आई है, लेकिन जब से आई हैं तब से संयुक्त संचालक स्तर के दो अधिकारी इनके ऐसे दीवाने हुए कि आपस में ही भिड़ गए हैं। एक अफसर तो इतने लट्टू हो गए हैं कि महिला ने जिनके-जिनके नाम रिकमेंड किए, उनकी शाखा ही बदल दी। अब दोनों ही अफसर तरह-तरह के जतन करके महिला अधिकारी को रिझाने की कोशिश में लगे रहते हैं। महिला अधिकारी भी कम नहीं, जब जिसका पलड़ा भारी होता है उस ओर मुस्करा देती है। आगे के हाल तो भईयां तीनों ही जानें..!