Wednesday, October 14, 2009
भुल जाओ गुजिये ........
Saturday, October 3, 2009
साबरमती के संत के नाम सोने का पेन
महात्मा गांधी जो आधी धोती और खड़ाऊ में दुनिया घूम आए। एसेसरी के नाम पर कमर में लटकाने वाली घड़ी ,चश्मा और एक लकड़ी जिनकी कीमत कुल मीलाकर उस समय शायद दस - पंद्रह रू. से ज्यादा न होगी। हाथ से सूत कातने वाला महात्मा गांधी,खुद अपने हाथों से झाडू , साफ - सफाई करने वाला महात्मा गांधी, सादगी का प्रतिमान महात्मा गांधी आज फैशन के बाजार में आ पहुंचा है। जिस महात्मा गांधी वाक्स थे कि जिस देश में लाखों भूखें - नंगे रहते हों उस देश के लोग कैसे शरीर पर सोना पहन सकते हैं ? आश्चर्य होता है। उसी महात्मा गांधी के नाम पर क्लासिक कलम बनाने वाली विख्यात कंपनी ''मोब्ला'' भारत में अंग्रेजी राज द्वारा नमक कर लगाने पर ''नमक कर'' के खिलाफ महात्मा गांधी की ''दांडी मार्च'' से प्रेरित होकर महात्मा गांधी लिमिटेड एडिशन २४१ ब्रांड कलम सोने के तार के साथ निकल रहा है, जिससे चरखे के धागे से बुने कपड़े के स्पर्श का सा अनुभव होगा। सोने के तार,महात्मा गांधी के चरखे का सुत का आपको अनुभव देगे। रेडियम पालिश वाले १८ केरेट की सोने की नीब होगी, जिसमें लाठी पकड़े महात्मा गांधी की आकृति अंकित होगी। जो महात्मा गांधी सादगी का पूरजोर समर्थक ही नहीं, बल्कि साक्षात उदाहरण थे, उनके नाम पर यूं सोने, चांदी के पैन बनाने वालों ने कभी सोचा कि महात्मा गांधी एक साधारण कलम से पेपर के दोनों ओर लिखते थे,जिससे पेपर की भी बचत हो सकें। ऐसे महात्मा गांधी की आत्मा को क्यों दुःख दिया जाए। दुनिया भर के पूंजीपति अगर महात्मा गांधीको सच्ची श्रद्वा करते हैं और महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलने की सोचते हैं,तो उनका पहला कदम महात्मा गांधी की दांडी यात्रा के साथ होना चाहिए दुनिया से गरीबी हटाना, हिंसा रोकना,युद्व विहिन, हथियार विहिन संसार का निर्माण करना। अगर महात्मा गांधी के नाम के साथ आगे आना चाहते हैं तो अंधी परम्पराओं को तोड़ आत्म ज्ञान से नाता जोड़कर सदाचार और अहिंसा परमोधर्म से दुनिया को जोड़ने का काम करें न कि सोने - हीरे - जवाहरात के महात्मा गांधी नामी पैन सिक्के निकाल उनके नाम पर व्यापार करें। महात्मा गांधी को पहले नेताओं ने भूनाया फिर कुछ दुकानदार टाईप लोगों ने, अब महात्मा गांधी के साथ जबकि ओबामा जैसी शख्सियत डिनर करना चाहती है, तो बड़े उघोगपतियों की नजर महात्मा गांधी नाम के उस हीरों पर आ टिकी है, जिसे प्रचार की जरूरत नहीं,हाथों - हाथ उनका माल बिक जाएगा और महात्मा गांधी को भी मॉडल बनाने की कीमत नहीं देनी होगी।Friday, September 25, 2009
कब आएगी बहार वीराने में ?
आजादी के छ : दशक पार करने के बाद भी देश को गरीबी के बंजर से निजात नहीं मिल पायी है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने कितने हीकीर्तिमान क्यों न गढ़े हों, लेकिन हकीकत यही है कि आज भी देश में अस्सी प्रतिशत लोग बीस रूपए से भी कम की दैनिक आमदनी में जीवन - यापन कर रहे हैं। ये ऐसा बंजर है, जहां खुशहाली की लहलहाती फसल का सपना देखने वाली आंखें इसके इंतजार में बूढी हो गई, लेकिन खुशहाली का वो मंजर उन्हे ताउम्र नजर नहीं आया। दौर आए और गए, मगर गरीबी का बदस्तूर आज भी जारी है। बढ़ती महंगाई ने भी आम आदमी की कमर तोड़ रखी है। देश में कांक्रीट का जंगल भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि दुनिया की सबसे बड़ी झोपड़पटी भी हमारी आर्थिक राजधानी मुंबई के धारावी में ही है। इस गरीबी के दलदल में जीने वाले करोड़ों लोगों की आंखों में भी सपने पलते है। यो बात और है कि वो इन सुखद सपनों को यथाथ के धरातल पर नहीं ला पाते, लेकिन दो वक्त की रोजी का जुगाड़ करने वाला गरीब आंखों में ये सपने लिए जीभर के सोता है। देश तरक्की कर रहा है और यह भी संभव है कि विकाससशील देशों की श्रेणी में आने वाल भारत विकासित देशों की श्रेणी में भी आ जाए, लेकिन गरीब की आंखों में पलने वाले सपनों को मूर्तरूप दे पाने में हमें कितना वक्त लगेगा यह एक अबूझ पहेली ही जान पड़ती है। 
Tuesday, September 22, 2009
बाजार में सच का सामना
सच का सामना इन दिनों एक टीवी चैनल पर आ रहा कार्यक्रम - सच का सामना,खासी चर्चा ओं में है। कई तरह के सवालों के साथ इसे नैतिकता के खिलाफ और पक्ष में बताने वाले लोगों के वर्ग खड़े हो गए हैं। मीडिया में बहसें हो रही हैं और कुछ लोग इसे रोकने के लिए कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा रहे हैं। इस सबके बीच शायद इसकी असलियत तक पहुंचने की जरूरत और समझ गुम हुई जा रही है। सबसे पहली बात यह की मीडिया को इस सीरीयल के महिमामंडन या खालिस निदां से ऊपर उठकर आम आदमी को यह बात समझाने की कोशिश करनी चाहिए थी कि इसमें न कोई सच है न ही किसी को इसका सामना करना पड़ता है, इस पूरे झमेले में यदि कोई बात सच है तो वह है बाजार। यह बाजार का सच है या यूं कहें कि यह बाजारू होता सच है। यह सीरीयल साल २००८ में अमेरिका में प्रसारित धरावाहिक द मोमेंट आफ ट्रथ का भारतीय संस्करण है। यहां यह बात गौरतलब है कि अमेरिकी समाज की भारतीय समाज से बुनियादी तौर पर कोई समानता नहीं है। अमेरिकी समाज हमेशा से ही पूंजी ही समाज के केंद्र में रही है, यह समाज सफलता को ही सच मानता है। इस समाज का आदर्श यह कभी नहीं रहा कि क्या कहा जा रहा है, इसका आदर्श रहा है कि कौन कह रहा है। यदि सफल आदमी कोई बात कहता है तो वह भले ही दो कौड़ी की हो, उसकी कोई भी सामाजिक उपयोगिता न हो लेकिन उसे बड़े ही ध्शन से सुना जाता है। इसी प्रवृति के कारण वहां सफल लोगों की अंतरंग बातें ध्यान से सुनी जाती हैं, उनके सेक्स वीडियो टेप जारी होते हैं और ऐसे सेलेब्रिटी खुद अपनी फूहड़ और घटिया करतूतों का महिमागान करते देखे जा सकते हैं। किसी दार्शनिक ने कहा था कि अमेरिकी समाज सभ्य नहीं है। यह बर्बरता से सीधे विकसित अवस्था में आ गया है। इसके बीच की एक जरूरी सीढ़ी होती है सभ्यता जिसे वह गोल कर गया,इसलिए सभ्य समाजों के जरूरी संस्कार वहां मौजूद ही नहीं हैं। ऐसे अमेरिकी समाज के लोकप्रिय धारावाहिक का भारतीय संस्करण है सच का सामना। इसमें आने वाले सेलेब्रिटी प्रतिभागियों से पूछा जाता है शादी के पहले आपके शारीरिक संबंध थे ? शादी के बाद आपके शारीरिक संबंध रहे है ? क्या आपने कभी गर्भपात कराया है या आपने किसी महिला को अपने बच्चे का गर्भपात कराने के लिए कहा ? ऐसे ही सवालों के कारण यह सीरियल चर्चाओं में है। यह ध्यान देने वाली बात है कि इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों से कुल २२ सवाल पूछे जाते हैं, इनमें से कुछ सवाल ऐसे जरूर होते हैं जिनका संबंध सेक्स से होता है। यदि इन सवालों को कार्यक्रम से हटा दिया जाता है तो यह दूसरे कार्यक्रमों के समान ही हो जाएगा, इसीलिए इसे खास बनाने के लिए ऐसे सवाल इसमें शामिल किए गए हैं। इस सीरीयल के मुताबिक सेक्स ही सच की सबसे बड़ी कसौटी है। सेक्स से जुड़े ऐसे सवालों के जवाब जो भारतीय समाज में सहज नहीं माने जाते हैं, इस कार्यक्रम के आकर्षण की वजह हैं। उदाहरण के विनोद कांबली से उनकी पत्री की मौजूदगी में पूछा गया कि क्या उनके शादी से पहले किसी औरत से जिस्मानी ताल्लकात थे ? यह सवाल और इस पर विनोद की स्वीकारोक्ति ही ऐसी बातें हैं जिनमें इस कार्यक्रम की जान है। धड़कने बढ़ जाती हैं। यह मशीन इसी सिद्वांत पर काम करती है। लेकिन यह भी ध्यान देने की बात है कि ऐसा तभी होता है जब जब कुछ अचानक हो। यदि कोई व्यक्ति झूठ के प्रति बेहद सहज हो जाए तो उसे पकड़ पाना इस मशीन के बस की बात नहीं होगी, कयोंकि तब उसकी धड़कने सामान्य होंगीं। यह बात इस कार्यक्रम के प्रायोजक भी जानते हैं इसीलिए वे सच के लिए इस मशीन पर निर्भर नहीं हैं। जानकारों का मानना है कि दर असल होता यह है कि जिस सेलेब्रिटी की इस कार्यक्रम में शामिल होने की सहमति मिल जाती है उसमें जुड़ी कुछ ऐसी बातों के बारे में जानकारी हासिल कर ली जाती है जो लोगों के लिए जिज्ञासा का कारण बन सकती हैं। ये जानकारियां ऐसे सेलेब्रिटी के दोस्तों, रिश्तेदारों और कभी - कभी खुद उसी से मिल जाती हैं। जाहिर है कि जो बात एक तरह से जग जाहिर हो उसे ही पर्दे पर लाने के लिए मशीन के टोटके का इस्तेमाल किया जाता है ताकि लोगों में प्रामाणिकता की छाप छोड़ी जा सके। जो लोग कार्यक्रम के प्रतिभागी होते हैं वे भी जानते हैं कि उनके बारे में जानकारियां जुटा ली गई हैं इसलिए वे मशीन के सामने भी सहज होते हैं। कभी - कभी ऐसा हो सकता है कि कोई प्रतिभागी अपनी जिंदगी की अंतरंग बातों को पर्दे पर लाए जाने से अचानक घबराए और झूठ साबित कर देगा। इसमें इस मशीन की कोई भूमिका सही अर्थों में बिल्कुल नहीं होती। मशीन का कुल इस्तेमाल दर्शकों पर धाक जमाने के लिए ही किया जाता है। कुल मिलाकर यह सीरीयल जन - भावनाओं को भुनाने की नई कोशिश है लेकिन इसका सामाजिक प्रभाव बहुत गहरा हो सकता है। सेलेब्रिटी हमेशा से ही आम - आदमी के लिए रोल मॉडल रहे हैं। वे जो कहते और करते हैं उन्हें आम - आदमी अपने जीवन में उतारने की हर संभव कोशिश करता है, ऐसे में यदि उसके रोल मॉडल ही अनैतिकता और मुक्त सेक्स संबंधों की बात खुलकर करेंगे तो उनसे प्रभावित लोगों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह आसानी से समझा जा सकता है।
सिर्फ अनैतिकता है सच :- सवाल यह है कि जो बोला जा रहा है क्या वह सच ही है ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जो बोला जा रहा है वह बाजार के इस रूख को भांप कर ही बोला जा रहा हो कि अनैतिकता ही आकर्षण का केंद्र है तो उसे ही बोला जाए, उसे ही अपना सच बताया जाए ? मामला बड़ा सीधा सा है। अब यदि आपने चोरी नहीं कि तो आप इस बाजार में कौड़ियों के मोल भी नहीं बिकेगी। यदि आप यह कह दें कि शादी के पहले या बाद में आपका किसी से अनैतिक संबधं नहीं रहे तो आप इस बाजार के नहीं, इसके कूड़ादान में फेंके जाने वाली चीज हैं।
सच के टोटके :- इस कार्यक्रम में एक नई बात भी है जो लोगों को आर्षित कर रही है। इसमें पॉलीग्राफ मशीन इस्तेमाल किया गया है जो कार्यक्रम प्रायोजकों के मुताबिक झूठ पकड़ लेती है। इसी प्रचार के कारण आम - आदमी को इस कार्यक्रम पर बड़ा विश्रास है, कई तो ऐसे लोग हैं जो इसी कारण प्रायोजकों से ज्यादा वजनदारी से इस कार्यक्रम के सच की वकालत करते दिखाई देते हैं। लेकिन कुछ सवाल हैं जो इस मशीन और इस पूरे कार्यक्रम को मजबूत शक के दायेर में लाते हैं। पहला सवाल है मशीन की कार्यप्रणाली और क्षमता पर - ऐसा माना जाता है कि यह मशीन लाई डिटेक्टर यानी झूठ पकड़ने का काम करती है। यह सर्वमान्य बात है कि यदि कोई व्यक्ति झूठ बोलता है उसके हदय की
सीरीयल का मनोविज्ञान :- यह सीरीयल दरअसल भारतीयता के दो मूल्यों को अपनी तरह से भुनाने की कोशिश है। पहला नैतिकता और दूसरा सच। ये दोनों ही बातें हजारों सालों से भारतीय समाज की बुनियाद रही हैं। यदि कोई व्यक्ति नैतिकता के मापदंड पर खरा नहीं उतरता था तो उसे सामाजिक निंदा का पात्र बनना पड़ता था। अब ऐसी बात भले ही कम होती जा रही हो लेकिन किसी व्यक्ति का नैतिकता का उल्लंघन और फिर उसका स्वीकार लोगों को मनोवैज्ञानिक रूप से अजीब सा सुकून देता है, क्योंकि बकौल दुष्यंत - इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं, हर कोई अनैतिकता में कहीं न कहीं से शामिल है, मात्रा में भले ही भेद हो सकता है लेकिन शामिल जरूर है। तो इस सीरीयल का पहला मकसद आदमी को यह तृप्ती प्रदान करना है कि वह अकेला अनैतिक नहीं है, दूसरे लोग भी खासकर समाज के सफल लोग भी अनैतिक हैं। लोगों में तुष्टि की यह भावना जगाने के साथ ही यह सीरीयल इसमें शामिल प्रतिभागियों के प्रति सहानुभूति और सम्मान जगाने की कोशिश भी करता है। दर्शकों को लगता है कि देखो इसने कितनी हिम्मत से आखिर सच तो बोला।
नेता क्यों नहीं :- यदि सच परख इतनी आसान है तो देश के नेताओं को इस कार्यक्रम का हिस्सा बनाने की जुगत क्यों नहीं की जाती ? इसका कारण यह लगता जरूर है कि नेता इस कार्यक्रम में आना ही नहीं चाहेंगे लेकिन ऐसा है नहीं। ऐसा न होने के पीछेसबसे कारण है प्रामाणिकता का अभाव। यदि किसी नेता को कार्यक्रम में बुलाया गया तो यह पहले से ही तय बात होगी कि वह झूठ ही बोलेगा लेकिन उसे पकड़ने के लिए न ही तथ्यात्मक रूप से कोई जानकारी होगी और न ही पॉलीग्राफ मशीन उसे पकड़ पाएगी, ऐसे में कार्यक्रम का मकसद ही धरा रह जाएगा। इसीलिए नेताओं को इसमें नहीं बुलाया जाता।
Friday, September 4, 2009
भारतीय जनता पार्टी में उठा - पटक से मध्य प्रदेश में खलबली
Saturday, August 22, 2009
ब्राम्हण पत्रकारों के भोज का सच
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को बदले जाने के लिए ब्राम्हण पत्रकारों ने लाबिंग शुरू कर दी हैं इंदौर के पैसे से भोपाल में पत्रकारों के लिए एक भोज रखा गया था भोज तो दरसल एक बहाना था इंदौर के एक बीजेपी नेता ने इस सब को प्रयोजित किया ओर ब्राम्हण पत्रकारों को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए ब्राम्हण मुख्यमंत्री को वक़्त की जरूरत बताया हलाकि इस आयोजन के जरिये एक तीर से दों निशाने साधने की कोशिश की गयी हैं एक तो ब्राम्हण मंत्रियों को इसके जरिये सीएम शिवराज सिंह से लड़वाने की कोशिश हैं और दूसरा अगर यह लडाई शुरू होती हैं तो इसका सीधा लाभ इंदौर को दिलवाया जाये और मालवा के दमदार नेता कैलाश विजयवर्गीय को मुख्यमंत्री बनवाया जाये इस सब जोर गणित के पीछे ब्राम्हण पत्रकारों को मोहरा बनाया जा रहा हैं और गरीब गुरबे पत्रकार अपने ही बीच के कुछ दल्ले नुमा पत्रकारों की चाल को भोज करने के बाद ही समझ पाए भोज में शामिल अधिकांश पत्रकार भोज कर वापस हो लिए क्यूंकि इस आयोजन में जो चहरे सामने आये उनमे कुछ घोषित दलाल , कुछ घोषित शराबी और कुछ घोषित स्त्रीलोलुप पत्रकार थे इनमे वे लोग भी शामिल हैं , जिनके दामन पर अमानत में खयानत और लड़कीबाजी तक के दाग लगे हैं इस भोज में गए पत्रकार सुरेश शर्मा ने बताया की मुझे तो इनका एजेंडा तक नहीं पता था , मुझे तो अचानक भाषण देने को खडा कर दिया गया इसका औचित्य क्या था मुझे तो यह तक नहीं पता था ब्राम्हण भोज के लिए लाखों रूपये एक इन्दौरी दलाल ने दिए थे उनका मकसद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के खिलाफ ब्राम्हण पत्रकारों को एकजुट करना और इस बात को फैलाना था कि शिवराज के सामने ब्राम्हण मंत्री अनूप मिश्रा , गोपाल भार्गव और लक्ष्मीकांत शर्मा अब एक चुनौती हैं लेकिन इस आयोजन में बिचौलिये और कुछ चरित्रहीन ब्राम्हण पत्रकारों के सामने आने से यह शो फ्लॉप हो गया , अच्छी संख्या के बावजूद सभी ब्राम्हण पत्रकारों को एक राए नहीं किया जा सका इसमें शामिल दो पत्रकारों को लाल बत्ती चाहिए थी तो आठ को सरकारी फिल्म के टेंडर तो बाकि को सप्लाई ऑडर चाहिए थे सब के अपने अपने एजेंडे थे इनमे से २७ लोग ऐसे थे जो पत्रकार बिरादरी में सिर्फ काले काम को छुपाने के लिए हैं एक एसा था जिसके चेहरे पर उसके काले कारनामो कि कालिख साफ़ नज़र आती हैं इनमे कुछ अपने कारनामों से इतने बदनाम हो चुके हैं कि वे ऐसे आयोजन के जरिये अपने अस्तित्व को तलाश रहे हैं इनमे से कुछ कि चिंता यह थी कि उनकी सरकारी नौकरी वाली बीवियों के तबादले न हो और अगर हो गया हैं तो उसे कैसे रुकवाया जाये ब्राम्हण पत्रकारों कि एकता के नाम हुए इस आयोजन से तमाम सारे उन पत्रकारों ने दूरी भी बनाये राखी जो सिर्फ पत्रकारिता में यकीन रखते हैं इंदौरी अंदाज में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के खिलाफ मोर्चा खोलने के इस अभियान कि वैसे तो अपने आप ही हवा निकल गयी क्यूंकि २७ लोग मिलकर क्या खिचडी पका रहे हैं , यह बाकि पत्रकारों कि समझ में आ गया कार्यक्रम में शामिल मनोज मिश्रा ने कहा कि "दलालों और चरित्रहीन के रहते ऐसा कोई आयोजन सफल नहीं हो सकता क्यूंकि पत्रकारिता किसी जाती विशेष से जुडा मसला नहीं हैं हम सारे समाज के हैं सिर्फ ब्राम्हणों के नहीं जो लोग भी इस आयोजन के पीछे हैं वे भी समझ ले पहले पत्रकार को पत्रकार बन जाने दो फिर उसे ब्राम्हण और राजपूत या दीगर जात में बाँटना वैसे भी उस आयोजन में जो लोग सामने थे उनके लक्षण ब्राम्हणों वाले थे नहीं कुछ कि काम वास्नाये उनके चेहरे पर थी तो कुछ सुबह से ही दारु पी कर चले आये थे" इस आयोजन से उम्मीद थी कि सारे ब्राम्हण कलमघिस्सू एक हो कर राजनीती में बदलाव की नई इबारत लिखेंगे लेकिन हुआ ठीक उसका उल्टा इनमे जिन चेहेरों को सामने लाया गया उनके कारनामों से ब्राम्हण जाति और पत्रकारिता दोनों शर्मसार हुई सो अधिकांश ब्राम्हण पत्रकारों ने भोज किया और अपने-अपने घर खिसक लिए आयोजन स्थल पर जो लोग बचे थे वे सोंचे ,वे क्या वाकई पत्रकार हैं और क्या सिर्फ पत्रकारिता कर रहे हैं या इसकी आड़ में उनकी मंशा कुछ और हैंThursday, July 16, 2009
अब ठगी भी कर रहा है साधना न्यूज़ चनैल
मध्यप्रदेश का साधना न्यूज़ चैनल अब गरीब पत्रकारों के साथ ठगी भी कर हैं उमरिया के पत्रकार राजकुमार सिंघई ने पुलिस में शिकायत की है कि साधना न्यूज़ के एस.पी.त्रिपाठी ने उसे नौकरी देने के नाम पर पच्चीस हज़ार का डी.डी ले लिया और नौकरी किसी और को दे दी और डी.डी भी वापस नहीं किया पीड़ित पत्रकार ने पुलिस से ठगी की शिकायत की हैं और अपने पसीने कि गढ़ी कमाई वापस दिलाने की मांग की हैं पुलिस को की शिकायत में पत्रकार राजकुमार सिंघई ने बताया कि १४ फरवरी को राज एक्सप्रेस में संवाददाता-रिपोर्टर बनाने के लिए विज्ञापन निकला था जिसकों पढ़ कर मेरे द्वारा अपना बायोडाटा ई.मेल के माध्यम से दिल्ली एवं डाक द्वारा साधना न्यूज़ चैनल मध्यप्रदेश के ब्यूरो आफिस भोपाल भेजा था २३ मार्च २००९ को फोन द्वारा मुझे सूचित किया गया की आप 2५०००/- रु की डी.डी लेकर आ जाये २४ मार्च २००९ को मेरे द्वारा स्टेट बैंक ऑफ़ इंदौर से २५०००/- डी.डी जिसका क्र. १७१७५७ हैं जो २४ मार्च २००९ को बनवाकर २४ मार्च २००९ को रात दुर्ग भोपाल से ट्रेन द्वारा भोपाल के लिए रवाना हुये मेरे साथ कौशल विश्वकर्मा भी भोपाल के लिए रवाना हुए २५ मार्च २००९ को साधना न्यूज़ चैनल के एम्.पी.नगर जोन-१ के कार्यालय पहुँचकर योगेन्द्र शुक्ला जो उक्त कार्यालय के हेड हैं उनको उनको मैंने २५०००/- रु की डी.डी दी उनके द्वारा बोला गया की आप दो मिनट के लिए एस.पी.त्रिपाठी (न्यूज़ एडिटर) से मिल ले जब तक एग्रीमेंट एवं ज्वानिंग लेटर तैयार करा रहा हूँ मैं तत्काल योगेन्द्र शुक्ला के बगल में स्थित एस.पी.त्रिपाठी के चेम्बर में पंहुचा उन्होंने मेरे से कैमरे के बारे में जानकारी ली उस समय वहाँ पर मध्यप्रदेश के ब्यूरो चीफ अजय त्रिपाठी भी उपस्थित थे उसके बाद एस.पी.त्रिपाठी मेरे को थोडी देर में मिलने को बोले मैं तत्काल चेम्बर से बहार आया चेम्बर के अन्दर एस.पी.त्रिपाठी एवं कौशल विश्वकर्मा के बीच चर्चा होती रही उनके बीच क्या चर्चा हुई इसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं हैं एस.पी.त्रिपाठी एवं कौशल विश्वकर्मा के सम्बन्ध काफी समय पहले से थे इस बात की जानकारी मुझे उसी दिन लगी फिर एस.पी.त्रिपाठी द्वारा मेरे को अपने चेम्बर में बुला कर बोला गया की आप ३ बजे के बाद आइये उसी दिन जब मैं ३ बजे उनके पास पहुंचा तो एस.पी.त्रिपाठी ने कहा की अभी दिल्ली चर्चा नहीं हो पायी हैं आप का बायोडाटा एवं पता हमारे पास हैं नियुक्ति की सूचना एक-दो दिन में फोन या लिखित रूप से उमरिया भेज देंगे यह सब हो जाने के बाद उसी दिन इंदौर-बिलासपुर से उमरिया वापिस आ गया एक सप्ताह तक इंतजार करने के बाद साधना न्यूज़ भोपाल एवं दिल्ली से किसी तरह की भी मुझे सूचना न मिलने पर फोन से योगेन्द्र शुक्ला एवं एस.पी.त्रिपाठी जो की साधना न्यूज़ चैनल भोपाल हेड हैं फोन से सम्पर्क करने पर उनसे अनुरोध किया की अभी तक साधना न्यूज़ चैनल से हमारा नियुक्ति पत्र नहीं आया हैं तो कृपया कर हमारे द्वारा दिया गया पच्चीस हजार वापस कर दे तो उन्होंने बताया की कुछ समय और लगेगा क्यूंकि साहब इंडिया से बहार गए हुए है इसी बीच मुझे पता लगा की साधना न्यूज़ में कौशल विशकर्मा को नियुक्त कर दिया गया है तो मैंने फोन से सम्पर्क किया और अपने पैसे की मांग की उनके द्वारा बताया गया की आपकी डी.डी कंपनी द्वारा बैंक से भुगतान प्राप्त कर लिया हैं आप को चे़क के माध्यम से आपका भुगतान जल्द ही करा दिया जायेगा ,लेकिन आज तक मुझे मेरा पैसा वापिस नहीं दिया गया तब मुझे लगा की साधना न्यूज़ चैनल में पदस्थ योगेन्द्र शुक्ला , एस.पी .त्रिपाठी एवं कौशल विशकर्मा ने साथ मिलकर मेरे साथ २५००० /-रु की ठगी कर ली गयी हैं पत्रकार राजकुमार सिंघई मध्यप्रदेश वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के प्रदेश प्रतिनिधि हैं उन्होंने अपने साथ हुई ठगी की शिकायत सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय दिल्ली , मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक से भी की हैं उमरिया के पुलिस अधीक्षक ने इस मामले में पीड़ित पत्रकार को पैसा वापस दिलवाये जाने के लिए भोपाल एस.पी. को शिकायत पत्र भेज दिया हैं दूसरी ओर साधना चैनल के प्रवक्ता ने कहा कि राजकुमार सिंघई हमारे यहाँ ब्लैक लिस्टेड हैं इस लिए उन्हें नौकरी नहीं दी गई ऐसे में सवाल यह है कि राजकुमार ब्लैक लिस्टेड हैं तो साधना के लोगो ने उनसे २५०००/-रु क्यों लिए साधना चैनल इससे पहले भी उमरिया में सुशील सिंघल ओर सुरेन्द्र त्रिपाठी से पैसे लेकर ऐसा ही बर्ताव कर चूका हैं इन लोगो का कहना हैं साधना चैनल पत्रकारिता तो कम अवैध वसूली ज्यादा करवाता हैं वैसे भी साधना चैनल में एस.पी.त्रिपाठी से नीचे तक ऐसे लोगो की भरमार ज्यादा हैं जिनके गिरेवान में सिर्फ दाग ही दाग हैं यही वजह हैं की साधना न्यूज़ साहरा समय को चुनौती देना तो दूर उसके आस पास भी नहीं फाटक पा रहा हैं 